“Acting monologue for Male”


मैडम कामिनी, मैं अपना इस्तीफा देकर यहां से जा रहा हूं। साथ ही आपसे कुछ सीख कर जा रहा हूं। आप मुस्कुरा कर सोच रहीं होंगी कि यह कितना भोला, कितना भावुक, नादान इंसान हैं, जिसे मैने अपने रूप रंग, फेयरनेस के जाल में, बाहरी दिखावें और अपनी डिप्लोमेसी के दबाव में दबाएं रखा। जिसे छोटी छोटी बातों में बांस का हवाला देकर, उनसे नजदीकियां जता कर, डरा डरा अपनी उंगलियों पर नचाएं रखा। यह नादान भावुक बच्चा, बात बात पर आंसू टपकाने वाला पागल। आपसे… आखिर आप कमीनी से, क्या सीख कर जा रहा हैं ?
तो जानिए कामिनी मैडम, आपने जो कमीनेपन का ऐटिट्यूड अपना रखा है ना। जिससे आप अपने अधीनस्थ लोगों को डरा डरा कर उनके सीधेपन का  इस्तेमाल करती हैं ना। मैडम, आप अपनी ग्रूमिंग में इतना समय, पैसा खर्च करती हैं अपने ग्लैमर का प्रदर्शन कर पैसेवाले प्रभावशाली लोगों से मधुरता बना कर, अपना स्वार्थ सिद्ध करती हो। दूसरी ओर सलोनी जैसी साधारण कर्मचारियों को मानसिक तनाव देकर, डिप्रेशन का शिकार बनाकर रखती हों। मैं सीखकर जा रहा हूं कि आप जैसे लोगों से दो गज नहीं, सो गज की दूरी बना कर रखूंगा। सलोनी जैसी साधारण गरीब को बख्श दो। कहीं ऐसा ना हो जाए कि उसके आसूं आपका सारा दिखावा धो डालें और आपके अन्दर की सारी कालिख लोगो को दिखाई देने लगे। जिसे छिपाने, दबाने के लिए कोई भी मेकअप काम ना आएं। प्लीज थोड़ी सी अन्दर से भी फेयर हों कर लोगो की दुआओं का असर पाईयें। वर्ना याद रखियेगा, बदतमीजी, बदमिजाजी और बदसुलूकी का अंज़ाम बुरा होता हैं, बद्दुआओं का भी असर होता हैं।